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आधुनिक परिवेश के परे ब्रज की मस्ती भरी होली

कहीं उडता रंग गुलाल, तो कहीं चलती लाठियां

सुनील शर्मा

मथुरा। आज के आधुनिक परिवेश में भी ब्रज की होली ने अपने वास्तविक स्वरूप को वनाये रखा है। होली माधुर्य का पर्व है प्रेम रस रंग और उमंग का प्रतीक पर्व होली का वास्तविक आनन्द केबल ब्रज में ही मिल सकता है। इस आनन्द की अनुभूति के लिये सारे देश के लोग यहां बरवस ही खिचे चले आते है यही नही यहां की होली विदेशी पर्यटकों को भी यहां आने और इस आनन्द में डूब जाने को मजबूर कर देती है। ब्रज में होली पूरे एक महिने से अधिक दिनों तक खूव मस्ती के साथ मनाई जाती है। यहां होली का वास्तविक आनन्द यहां के देवालयों में मिलता है। मंदिरों में होली एक माह पूर्व ही शुरू हो जाती जब कहीं भी होली की चर्चा भी नही होती है। होली की शुरूआत मंदिरों में समाज गायन से होती है बसन्त पंचमी के दिन से मंदिरों में ठाकुर जी को इत्र और रंग लगा कर होली शुरू की जाती है। वृन्दावन में प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर तथा मथुरा में द्वारकाधीश मंदिर में होली की शुरूआत समाजगायन से की जाती है पंडा समाज के लोग बडे़ बडे़ नगाडों और ढोल मंजीरे की धुन पर नाचते गाते है।

हजारों हजारों वर्षों से ब्रज की धरती पर होली खेली जाती है इतिहास वदल गये, हमारी संस्कृति और परम्पराओं में बदलाव आया आधुनिकता ने हमें चारों ओर से घेर लिया है किन्तु ब्रज के कण कण में आज भी राधा कृष्ण का प्रेम और नटखट कृष्ण कन्हैया की और श्री राधा रानी की प्रेम भरी होली आज भी जनमानस के मनमस्तिक पर अमिट छाप की तरह हमेशा के लिये बनी हुई है। कान्हा की मधुर बासुरी की धुन और राधा रानी के नूपुरों की झनकार और उनके नृत्य आज भी हमें उनके हमारे बीच ही उपस्थिति का अहसास कराते रहते है। जब होली की कहीं भी चर्चा तक नहीं होती उस समय ब्रज में होली शुरू हो जाती है यहां होली का पर्व वंसत पंचमी से शुरू हो जाता है इसी दिन श्यामा श्याम को गुलाल लगा कर श्रंगार करने की परम्परा निभाई जाती है। इस समय जब भक्तों पर गुलाल पड़ता है तो वह इसे भगवान का प्रसाद मानकर अपने आपको धन्य मानते हैं। ब्रज में चारों ओर होली की अनूठी परम्पराओं के दर्शन होते हैं कहीं रगं गुलाल की होली होती है तो कहीं अंगारों की, कहीं फूलों की तो कहीं लाठियों और कोडों की होली होती है।

बरसाने और नन्दगांव में लाठियों की होली

यहां ब्रज की अनूठी होली होती है फाल्गुन शुक्ला नवमी को बरसाना में लठामार होली खेली जाती है कहने को बरसाना छोटा सा गांव है किन्तु श्री राधा रानी जी की बाललीलाओं का स्थान होने के कारण यह देश विदेश में विख्यात है। यहां होली खेलने के लिये कन्हैया के गांव नन्दगांव से हुरिहारे बरसाना आते हैं रंगविरंगी पगड़ी पहने हाथों में ढाल लिये ये सब पीली पोखर में पहुचते हैं। यहां भांग ठन्डाई छान कर सब आपस में हास परिहास करते हुए गीत गाते हुए बरसाने की उंची पहाडियों की तंग गलियों में होते हुये उपर बने हुए मंदिर में पहुंचते हैं। यहां श्रीजी के प्राचीन मंदिर में बरसाना और नन्दगांव के गुसाईयों में हास परिहास के बीच गीत संगीत का कार्यक्रम शुरू होता है। इसमें आपस में गालियों का प्रयोग करते हुए प्रेम और प्रीति के साथ हंसी ठिठोली भी होती है।

गीत संगीत और नृत्य कार्यक्रम के वाद नन्दगांव के हुरिहारे अपने अपने हाथों में ढाल लिये संकरी गली जिसका नाम रंगीली गली के नाम से जाना जाता है वहां एकत्रित हो जाते हैं और यहीं पर होती है विश्व प्रसिद्ध लठामार होली। इन संकरी गलियों में मोटी मोटी लाठियां लिये गोस्वामी परिवार की महिलायें गोपियों के रूप में अपने मुह पर घूंघट काढे़ नन्दगांव से आये हुरिहारों की प्रतीक्षा में होती हैं और जैसे ही वह यहां से गुजरते हैं उछल-उछल कर उन पर लाठियां बरसाती रहती हैं और नन्दगांव के हरिहारे जमीन पर बैठ कर उनकी लाठियों के प्रहार को झेलते रहते हैं। इस अनौखी होली का आनन्द लाखों श्रद्धालु वहां उपस्थित रह कर उठाते हैं। और होली का भरपूर आनन्द उठाते हुए लाडली लाल की जय जयकार करते हैं।

दूसरे दिन इसी तरह का माहौल नन्दगांव में होता है यहां भी नन्दराय जी का उंची पहाडी पर मंदिर है। बरसाने के हुरिहारे यहां आते हैं और नन्दगांव के गुसाईयों के साथ समाज गायन का कार्यक्रम होता है इसके वाद नन्दगांव के एक चैक में सभी एकत्रित होते हैं जिसमें नन्दगांव की हुरिहारिनें बरसाने के हुरिहारों के साथ लठामार होली खेलती हैं।

बरसाने नन्दगांव की होली की शुरूआत के साथही ब्रज मंडल में चारों ओर सतरंगी रूप निखर उठता है और चारों तरफ अलग अलग ढं़ग से होली खेलने की परम्परा शुरू हो जाती है। नन्दगांव की होली के अगले दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरनी एकादशी पर्व पर मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन आदि के मंदिरों में रंग और गुलाल के ऐसे बादल उड़ते हैं जिससे बच कर किसी का भी निकलना मुश्किल होता है।  मंदिरों में होने वाली सतरंगी होली का आनन्द भक्त और भगवान के बीच में खेला जाने वाला होली का वास्तविक आनन्द की अनुभूति कराता है।

फाल्गुन शुक्ला पर्णिमा को ब्रज में होली पूजन और होलिका दहन का दिन होता है इस दिन तिथि के अनुसार ही महिलायें होलिका का पूजन करती हैं और उसी के तहत ही रात्रि में शहर व गांव के हर गली मौहल्ले में होलिका दहन का कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर फालैन और जटवारी में गांव के बीचों बीच बडे से मैदान में हिरण्यकश्यप और होलिका के प्रतीक स्वरूप के दर्शन देखने को मिलते हैं जिसमें दोनों गावों में एक एक पन्डा कई दिनों से पूजा अर्चना करके आपने आप का शुद्ध मन से विशाल होली की लपटों से निकलने के लिये तैयार करता है। इस दिन पन्डा विशाल होली की लपटों के बीच से होकर छलांग मार कर बाहर आता है। यह रोमांचकारी दृश्य देश विदेश के लाखों लोगों के बीच सम्पन्न होता है। प्रहलाद के विशाल अग्नि से बाहर आने पर सभी भक्त प्रहलाद की जय जयकार करने लगते हैं।

होलिका दहन के अगले दिन धुलैडी के दिन समूचे ब्रज में सभी नर नारी मदमस्त होकर होली खेलते हैं एक दूसरे को रंग लगाते हैं जगह जगह गीत संगीत का आयोजन किया जाता है लोग ठन्डाई और भांग का सेवन करके माहौल को और उमंग से भर देते हैं नाचते हैं गाते हैं झूमते हैं आपस में रंग लगाते हैं खुशियां मनाते हैं मिठाई खाते हैं और खिलाते हैं और आपस में बधाईयों का आदान प्रदान भी करते हैं गले मिल कर आपसी प्रेम को और प्रगांढ़ करते हैं।

मथुरा में यमुनातट पर विश्राम घाट, स्वामी घाट, बंगाली घाट आदि क्षेत्रों में होली की छटा कुछ अलग ही देखने को मिलती है जगह-जगह घाटों की बुर्जियों में भांग ठन्डाई बड़ी-बड़ी सिलों पर पीसते हैं। इसके शौकीन मथुरा के चतुर्वेदी समाज के लोग बादाम, पिस्ता, काजू, मुनक्का, खरबूजे की मिंगी, सौंफ, कालीमिर्च, गुलकंद आदि को पीस कर एक गोले का रूप दिया जाता है। इसके वाद मनों दूध में इस मिश्रण को मिला कर सभी देवताओं का आवाहन करके फिर वहां उपस्थित लोग प्रसाद के रूप में इसका सेवन करते हैं। भांग की तरंग और ठन्डाई की उमंग के साथ सभी मस्ती में डूब जाते हैं फिर शुरू होती है होली की तान।

होली का त्यौहार बेसे तो पूरे देश में अपने अपने तरीके से मनाया जाता है लेकिन ब्रज की होली जैसा आनन्द और रंगीन मस्ती कहीं नहीं होती है। अब होली का आनन्द पूरे महिने भर गांव गांव में हुरंगों के रूप में देखने को मिलता है।

चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया से नवमी तक ब्रज के हुरंगे और फूलडोल के आयोजन होते हैं जिसमें जगह जगह होली के रसिया और गीत संगीत के आयोंजन और होली मिलन समारोह आयोजित किये जाते हैं। मुखराई, ऊमरी, रामपुर, अहमल कलां, बछगांव, सौंख आदि आठ गांवों में चरकुला नृत्य का अयोेजन होता है यह ब्रज का परम्परागत लोकनृत्य है जिसमें चांदनी रात में सैकडों दीपों से जगमगाता 40 से 60 किलो वजन का चरकुला सिर पर रखकर एक नृत्यांगना होली के रसिया गीतों के लय ताल पर थिरकती है। उपस्थित गावों के लोग रात भर इसका आनन्द लेते हैं। आधुनिकता से परे आज भी विशाल बम्ब (नगाडे) की ताल और अलगोजा, थाली, करताल, और मंजीरे की मधुर स्वर लहरियों के बीच इस नृत्य की समाप्ति पर नृत्यांगना को जुग जुग जीने की का आर्शीवाद भी गायन के साथ ही दिया जाता है। ‘‘जुग जुग जीओ मेरी नाचन हारी नाचन हारी के दुई दुई हुइयें’’।

दाऊजी का प्रसिद्ध हुरंगा

मथुरा से लगभग 22 किलोमीटर दूर बलराम जी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जहां दाऊजी का हुरंगा मंदिर प्रांगण में ही खेला जाता है। यहां महिलायें कपड़े फाड़ देती हैं और उनके कोडे बनाकर पुरूषों के नंगे शरीर पर मारती हैं। मंदिर के विशाल प्रांगण में निर्मित हौजों में टेसू के फूलों को भिगो कर रंग बनाया जाता है। हुरिहारे बाल्टियों में भर भर कर हुरिहारिनों पर डालते रहते हैं। मंदिर के छज्जों से अलग-अलग रंगों का गुलाल उडता रहता है अबीर और गुलाल का इन्द्र धनुषी छटा का आभास कराता यह हुरंगा सभी के मन को उमंगों से भर देता है।

इसी दिन कोसीकलां के निकट जाव और बठैन गांव में भी हुरंगा होता है जिसमें बलराम के प्रतीक के रूप में हरिहारों को राधारानी के प्रतीक रूप में महिलाओं से बड़ी मर्यादा के साथ होली खेलनी होती है। हुरंगा के शुरू होने से पहले शोभायात्रा के रूप में सिरदारी निकलती है इनकी यह शोभायात्रा राजा, महाराजा, जमीदारों की तरह बठैन के वयोवृद्ध जाब गांव में आते हैं उनका सम्मान किया जाता है। एक विशेष मिठाई खिलाई जाती है फिर सभी गांव के लोग एक मैदान में एकत्रित होते हैं जहां हुरिहारे हाथ में हाथ डाले एक घेरा बनाकर बीच में बलराम के प्रतीक को लेकर चलते हैं और गांव की हुरिहारिनें लाठियों से बठैन से आये हरिहारों को मारती हैं इस वार को हुरिहारे लाठीयों से ही रोकते रहते हैं घेरा के बीच में बलराम एक ध्वज को लेकर घूमता रहता है।

बसंत पंचमी से चैत्र कृष्ण नवमी तक चलने वाला 50 दिनों का गीत, संगीत, नृत्य, भक्ति और भाव रस, रंग, उमंग का यह त्यौहार ब्रजवासियों को मन तक भिगो कर तृप्त कर देता है। सभी की कांमना होती है कि सभी चिरजीवी हों और ब्रज में प्रति वर्ष होली खेलकर आनन्द की अनुभूति के साथ साथ भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का सन्देश जन-जन तक पहुंचाते रहें। जयश्री कृष्ण जयश्री राधे।

भगवान श्री कृष्ण-राधे रानी के श्री चरणों में-सुनील शर्मा

होली की इस बार सिर्फ ‘उमंग’ मंदिरों तक ही सीमित नजर आयी

मथुरा के एक मन्दिर में अभी कुछ दिन पहले ही खेली गयी होली के दौरान भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप बाल को कन्धो ंपर उठाकर भारी उत्साह के साथ होली खेलते भक्तो का अपाल जन समूह

मथुरा। ब्रज में फाल्गुन मास शुरू होने पर भी होली के उमंग उत्साह को कहीं नहीं देखा जा रहा है जबकि ब्रज में बसन्तोत्सव के पर्व से ही होली की धूम, होली के कार्यक्रमों केा देखा जा रहा है लेकिन कुछ वर्षों से ब्रज में होली का रंग फीका पड़ने लगा है। लोगों ने रंग डालने को लेकर कोई उमंग नहीं है। यही वजह है कि होली का उमंग सिर्फ प्रमुख मंदिरों में ही देखने को मिल रहा है जबकि ग्राम, कस्बों, शहर के गली मौहल्लों में एक माह पूर्व से ही होली की तैयारी को लेकर लोग पैसा इकट्ठा करने, लकड़ी आदि इकट्ठा करने के कार्यों को करते थे। वहीं ग्रामों में एक माह पूर्व में ही रंग गुलाल का उत्सव प्रारंभ हो जाता था लेकिन वर्तमान के समय में लोगों में आपसी प्रेम की कमी एवं परेशानियों के चलते होली का रंग फीका पड़ने लगा है। अब तो होली का त्यौहार मात्र धूल वाले दिन ही देखने को मिलता है। यह त्यौहार, बरसाना, नंदगांव, दाऊजी, जन्मस्थान एव मंदिरों तक ही सीमित होकर रह गया है। जबकि पूर्व में इस दौरान ब्रज में होली की फुहार के रंगों से कोई भी अछूता नहीं रहता था। हास परिहास, होली गीत, होली रसियाओं की महफिलें तो जेसे ब्रज से नदारद होती जा रही हैं। हों भी क्यों नहीं। ब्रज आधुनिकता के रंग में रंगता जा रहा है। यहंा अब आधुनिकता के कार्यक्रम पाश्चात्य संगीत नांच के कार्यक्रम, फ्लैट संस्कृति के आने तथा वैलेंटाइन डे जैसे प्रेम के उत्सवों को बढावा दिया जा रहा है। यही वजह है कि ब्रज में अब होली की उमंग मंदिरों तक ही सीमित रह गयी है।

होली का माहौल और श्री दाऊजी की होली परम्परा…

धर्मेंद्र कुमार

होली का त्योहार निकट है और मथुरा-वृंदावन के इलाकों में होली की सरगर्मियां पूरे उफान पर हैं। बाजारों और घरों में होली के आयोजन के लिए तैयारियां चरम सीमा पर हैं। रोजाना के दुख-दर्दों को भुलाकर लोग महीनेभर तक त्योहारी मस्ती में सराबोर रहने की तैयारी में जुटे हैं।

ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ जहां पूरी प्रकृति आह्लादित हो उठती है, वहीं जनमानस में भी एक विशिष्ट रस का संचार होने लगता है। पूरे बृज मण्डल के देवालयों में तो बसंत पंचमी से ही उत्सवों का श्री गणेश हो जाता है।

प्रायः सभी प्रसिद्ध देवालयों में रागरंग होते हैं, जो सम्पूर्ण होली पर्व तक चलते रहते हैं। रंगभरी पिचकारी में परम्परागत टेसू के रंग से बना सुगंधित रंग एवं सात रंगों के गुलाल की घुमड़न वातावरण में दैवीय कल्पना को साकार कर देते हैं। जहां तक देवालयों के उत्सवों की

परम्परा का विषय है, वहां श्री दाऊजी के देवालय की परम्परा विशिष्ट एवं अनूठी है। मदन महोत्सव के मुख्य देवता भी निश्चित रूप से बलराम, कृष्ण, प्रकृति रूपा राधारानी, रेवती तथा उनकी सखियां हैं।

बल्देव स्थित श्री हलधर समग्र दर्शन शोध संस्थान के निदेशक डॉ. घनश्याम पाण्डेय बताते हैं, ‘श्री दाऊजी मंदिर में यह उत्सव माघ शुक्ला बसंत पंचमी से शुरू होकर चैत्र कृष्णा पंचमी यानी डोलोत्सव तक चलता है। मंदिर की परम्परागत लोक गायकी की स्वर लहरी गूंजने लगती है और ‘खेलत बसंत बलभद्र देव। लीला अनंत कोई लहै न भेद’ जैसे पदों का गायन झांझ, ढप, मृदंग, हारमोनियम जैसे साजों के साथ प्रारम्भ हो जाता है। जैसे ही फागुन मास आता है, अनेकानेक समयानुरूप होली गायन प्रारम्भ होता है। सभी साजों की संगत के साथ समाज के स्वरूप का अनुमान तो इससे ही लगता है कि समूह समाज गायन की आवाज बिना किसी लाउडस्पीकर आदि की सहायता के मीलों दूर तक सुनी जा सकती है।’

इस पूरी परम्परा में श्रृंगार आरती एवं रात्रि को संध्या आरती का विशेष महत्व होता है। गुलाल उड़ने से सराबोर हुए श्रृद्धालु भक्त अपने आपको धन्य मानते हैं। होलाष्टकों से डोल पंचमी तक रंग की प्रक्रिया होती है, इसे शब्दों से वर्णन नहीं किया जा सकता, केवल देखकर ही इसे महसूस किया जा सकता है।

स्थानीय पत्रकार सुनील शर्मा ने बताया, ‘होली की पूर्णिमा से विशेष उत्सव प्रारम्भ हो जाता है। देवालय में रंग गुलाल अबीर चोबा चन्दन की बौछारें दर्शक के मन को मोह लेती है। शाम के समय श्री ठाकुर जी के प्रतीक आयुध हल-मूसल के साथ होली पूजन होता है जिसमें हजारों की संख्या में महिलाएं बाल, वृद्ध लोग सम्मिलित होते हैं। यह जुलूस अपनी अपने तरह का सम्पूर्ण बृज मण्डल में अकेला ही है। परिक्रमा मार्ग से लेकर होली पूजन स्थल करीब दो किमी है, सारे मार्ग में गुलाल भुड़़भुड़ की तहें जम जाती हैं। श्री नारायणाश्रम से प्रारम्भ यह यात्रा दो घण्टे में पूरी होती हैं रात्रि में ‘भागिन पायो री सजनी यह होरी सौत्योहार’ की शब्दावली अंतःकरण को छू जाती है।’

प्रतिपदा को मंदिर में वही रंग-गुलाल और दोपहर को सैकड़ों ‘भाभी-देवर’ मंदिर के प्रांगण में परम्परागत महारास का आयोजन करते हैं। सेवायतों की कुल बधुएं अपने देवरों के साथ विशिष्ट परिधानों से नृत्य करती हैं। शहनाई और नगाडे़ की स्वर-लहरी दर्शकों के लिए

दिव्यानुभूति का कारण बनती है और दर्शक उस रंग में डूबकर स्वयं को धन्य अनुभव करता है।

द्वितीया के दिन (इस साल 28 मार्च को) हुरंगा का आयोजन होता है। प्रातः 11 बजे से ही मंदिर प्रांगण में रंग की भरमार हो जाती है। बड़ी-बड़ी हौजों में टेसू के परम्परागत रंग की छटा बिखर जाती है। मंदिर प्रांगण में तथा चारों ओर छतों पर दर्शकों की भीड़ में तिल रखने की जगह भी नहीं बचती व स्थानीय दर्शक और विदेशी पर्यटक इस उत्सव में बरबस खिंचे चले आते है। दोपहर 12 बजे राजभोग का आयोजन होता है तथा दोनों भाइयों के प्रतीक दो झण्डे श्री ठाकुर जी की आज्ञा से मंदिर के मध्य में उपस्थित होते हैं। इधर, सेवायत गोस्वामी वर्ग की बधुएं एवं ग्वाल-बाल स्वरूप पंडागण मंदिर में एकत्रित होते हैं। पहले नृत्य होता है, उसके बाद ठाकुर जी की आज्ञानुसार खेल हुरंगा प्रारम्भ हो जाता है। यहां अत्यन्त मर्यादित तरीके से ही खेल होता है।

हुरियारे पुरुष अपनी भाभियों पर कुण्ड और हौजों में भरे रंग डालते जाते हैं और बदले में भाभियां उनके शरीर के वस्त्रों को पकड़कर खींच लेती हैं। उनके ऊपर डंडों से प्रहार करती हैं। छतों से उड़ते हुए विभिन्न रंगों के शुद्ध गुलाल नीचे नगाडे़ शहनाई की धुन परम दिव्य भाव उपस्थित कर देते हैं और ‘आज विरज में होरी रे रसिया…’ तथा ‘छोरा तोते होरी जल खेलूँ, मेरी पहुँची में घुँघरू जड़ाय…’ की ध्वनि श्रोताओं को मुग्ध कर देती हैं।

आकाश में उड़ते गुलालों के रंगों का मिश्रण मनमोहक होता है। इस वर्ण सम्मिश्रण हेतु अनेक कलाविद यहां वर्ण संयोजन का ही अनुभव एवं आनन्द लेने आते हैं। यह हुरंगा का खेल मध्यान्तर तीन बजे तक चलता रहता है। खेल के मध्य विराजित झुण्डों का श्री रेवती जी एवं श्री राधा जी के इशारे पर हुरियारी लूट लेती हैं और इस प्रकार उत्सव पूर्णता की ओर अग्रसर होता है तथा सभी खिलाडी परिक्रमा हेतु अग्रसर होते हैं तथा पूरी परिक्रमा में गूंजता है ‘हारी रे गोरी घर चलीं औरतें, तो मरूँगी जहर विष खाय..’ आदि-आदि। इस उत्सव में विशेष कर भांग के अनेकों प्रकार के मिश्रण ठाकुर जी के भोग में रखे जाते हैं।

ध्यान रहे, इस उत्सव में 20 मन गुलाल उड़ता है, जो कि एक रिकार्ड है। पंचमी के दिन होली की चरम परिणिति होती है। मंदिर में मध्यान्ह में समाज रंग गुलाल होता है तथा उस समाज का बहुत जी भावोत्पादक पर जब गाया जाता है तो बरबस श्रोता भाव विभोर होकर अश्रुपात करते देखे जा सकते हैं। ‘जो जीवै सो खेलै फाग हरि संग झूमरि खेलियै…’ रंगों को एक वर्ष के लिए विदाई दी जाती है।

Dharmendra Kumar
Editor
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